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(पीएम) संवाददाता  सूचना एवं जनसंपर्क विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा 30 जनवरी 2018 को उत्तर प्रदेश प्रेस मान्यता समिति का गठन एक लंबे अरसे बाद किया परन्तु गठन के बाद से ही वर्चस्व को लेकर पत्रकारों के महारथियों के कूदने से समिति विवादों में फंस गई । शासनादेश के अनुसार इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जनर्लिस्ट ( IFWJ) से शिव शरण सिंह , हरी कृष्ण अरोरा को नामित किया गया और उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संबाद दाता समिति के हेमन्त तिवारी गुट से श्रीधर अग्निहोत्री ,

सूचना विभाग ने जारी की दूसरा शासनादेश

औऱ इसी समिति के प्रांशु मिश्रा गुट से नीरज श्रीवास्तव को समिति में नामित करने का शासनादेश जारी हुआ परन्तु सूचना विभाग ने दूसरा शासनादेश देश जारी करते हुए IFWJ के शिव शरण सिंह , हरी कृष्ण अरोरा को समिति के नॉमिनेशन से निरस्तीकरण जारी कर दिया ऐसा कौन से कारण थे कि निरस्तीकरण जारी करना पड़ा । जानकारों का मानना है कि लखनऊ के चर्चित पत्रकार हेमंत तिवारी को जब से IFWJ ने संग़ठन से निष्कासित किया है तभी से तिवारी IFWJ से खार खाये है इसी लिए हेमंत ने इस वर्चस्व की जंग में अपने आका पूर्व प्रमुख सचिव नवनीत सहगल के माध्यम से IFWJ से नामित दो पत्रकारों को समिति से बाहर का रास्ता दिखाने में कामयाब हुए ।  जानकर यह भी मानते है कि नवनीत सहगल भले ही प्रमुख सचिव सूचना नही है लेकिन आज भी सूचना विभाग में उनकी अभी भी फ़ौज है जो उनके इशारे पर काम करती है और नवनीत सहगल का सूचना विभाग का प्रेम जगजाहिर है कारण अलग है यह बात अलग है । गौरवतलब है कि अगर निरस्तीकरण के शासनादेश को नजरंदाज कर दे तो दूसरा सवाल यह है कि

उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त समिति के दोनों गुटों से श्रीधर अग्निहोत्री , नीरज श्रीवास्तव के समिति में नामिति करने में सवाल तो उठाना स्वाभाविक है

उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संबाद दाता समिति का पंजीकरण रजिस्टार या ट्रेड यूनियन या अन्य किसी भी पंजीकरण करने वाली संस्था से नही है ऐसे में देखने वाली बात है कि गैर पंजीकृत संग़ठन से किस आधार पर सूचना विभाग द्वारा शासनादेश जारी कर एक नही दो पत्रकारों को समिति में नामिति करने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया. वैसे भी समिति के गठन के शासनादेश जारी होने के बाद से पत्रकारों के एक वर्ग ( मुस्लिम) में उपेक्छा को लेकर रोष तो है क्योंकि मुस्लिम वर्ग के पत्रकारों की संख्या है फिर उनका समिति में प्रतिनिधित्व क्यो नही खैर जो भी हो लेकिन इतना तो तय है कि पत्रकारों की इस वर्चस्व की जंग में जीत किसी की भी ही लेकिन आम पत्रकार को तो हारना ही है।

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